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जनहित याचिका का उद्देश्य निष्पक्ष होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ही निशाना
अन्य दलों के नेताओं के खिलाफ कथित हेट स्पीच को नजरअंदाज
जनहित याचिकाएँ वास्तव में “जनहित” के लिएराजनीतिक एजेंडे से प्रभावित
कानपुर: फ़रवरी 18, 2026
नई दिल्ली: 18 फरवरी 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका (PIL) का उद्देश्य निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने केवल भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ही निशाना बनाया अन्य दलों के नेताओं के खिलाफ कथित हेट स्पीच को नजरअंदाज कर दिया गया।
मुख्य बिंदु
कोर्ट ने याचिका को चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण बताया।
न्यायालय ने कहा कि अगर हेट स्पीच पर रोक लगाने की बात है, तो यह सभी दलों और नेताओं पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि उन्होंने विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं की।
इस तरह की टिप्पणियाँ न्यायपालिका के दृष्टिकोण को दर्शाती हैं कि कानून सबके लिए बराबर है और किसी भी कार्रवाई में राजनीतिक पक्षपात नहीं होना चाहिए।
यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जनहित याचिकाएँ वास्तव में “जनहित” के लिए हैं या कभी-कभी राजनीतिक एजेंडे से प्रभावित हो जाती हैं।
याचिका में मुख्य रूप से भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों (जैसे असम के हिमंता बिस्वा सरमा, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी आदि) के कथित हेट स्पीच का जिक्र किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण करार दिया, क्योंकि अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के समान बयानों को नजरअंदाज किया गया।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से सवाल किया कि अगर हेट स्पीच रोकने की बात है, तो यह सभी दलों और नेताओं पर समान रूप से लागू क्यों नहीं होनी चाहिए?
बेंच (CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना) ने कहा कि ऐसी याचिकाएँ किसी खास व्यक्ति या दल को टारगेट नहीं कर सकतीं। याचिकाकर्ताओं को सलाह दी गई कि वे संशोधित और निष्पक्ष याचिका दाखिल करें, जिसमें सभी पक्षों को शामिल किया जाए।
बेंच CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्याबागची और जस्टिस बी.वी.नागरत्ना ने कहा कि ऐसी याचिकाएँ किसी खास व्यक्ति या दल को टारगेट नहीं कर सकतीं। याचिकाकर्ताओं को सलाह दी गई कि वे संशोधित और निष्पक्ष याचिका दाखिल करें, जिसमें सभी पक्षों को शामिल किया कोर्ट ने जोर दिया कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग संवैधानिक नैतिकता का पालन करें, भाईचारा बढ़ाएँ और चुनाव आपसी सम्मान के साथ लड़ें। फ्री स्पीच का मतलब नफरत फैलाने का  लाइसेंस नहीं है।
जनहित याचिका
जनहित याचिका द्वारा भारतीय कानून में, सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए मुकदमे का प्रावधान है। अन्य सामान्य अदालती याचिकाओं से अलग, इसमें यह आवश्यक नहीं की पीड़ित पक्ष स्वयं अदालत में जाए। यह किसी भी नागरिक या स्वयं न्यायालय द्वारा पीडितों के पक्ष में दायर किया जा सकता है।
जनहित याचिका के अबतक के मामलों ने बहुत व्यापक क्षेत्रों, कारागार और बन्दी, सशस्त्र सेना, बालश्रम, बंधुआ मजदूरी, शहरी विकास, पर्यावरण और संसाधन, ग्राहक मामले, शिक्षा, राजनीति और चुनाव, लोकनीति और जवाबदेही, मानवाधिकार और स्वयं न्यायपालिका को प्रभावित किया है।[1] न्यायिक सक्रियता और जहिया का विस्तार बहुत हद तक समांतर रूप से हुआ है और जनहित याचिका का मध्यम-वर्ग ने सामान्यतः स्वागत और समर्थन किया है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी कानून में परिभाषित नहीं है। यह उच्चतम न्यायालय के संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न है, इसका कोई अंत‍‍‍र्राष्ट्रीय समतुल्य नहीं है और इसे एक विशिष्ट भारतीय संप्रल्य के रूप में देखा जाता है।
इस प्रकार की याचिकाओँ का विचार अमेरिका में जन्मा। वहाँ इसे ‘सामाजिक कार्यवाही याचिका’ कहते है। यह न्यायपालिका का आविष्कार तथा न्यायधीश निर्मित विधि है। भारत में जनहित याचिका पी.एन.भगवती ने प्रारंभ की थी।
ये याचिकाएँ जनहित को सुरक्षित तथा बढ़ाना चाहती हैं। ये लोकहित भावना पे कार्य करती हैं। ये ऐसे न्यायिक उपकरण हैं जिनका लक्ष्य जनहित प्राप्त करना है। इनका ल्क्ष्य तीव्र तथा सस्ता न्याय एक आम आदमी को दिलवाना तथा कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कार्य करवाने हेतु किया जाता है। ये ‘समूह हित’ में काम आती है ना कि व्यक्ति हित में। यदि इनका दुरूपयोग किया जाए तो याचिकाकर्ता पर जुर्माना तक किया जा सकता है। इनको स्वीकारना या ना स्वीकारना न्यायालय पर निर्भर करता है।
जनहित याचिकाओं की स्वीकृति हेतु उच्चतम न्यायालय ने कुछ नियम बनाए हैं-1. लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति, संगठन इन्हे ला सकता है
2. कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका मान कर ये जारी की जा सकती है
3. कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे
4. ये राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरूद्ध भी लायी जा सकती है
1. इस याचिका से जनता में स्वयं के अधिकारों तथा न्यायपालिका की भूमिका के बारे में चेतना बढती है यह मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को वृहद बनाती है इसमे व्यक्ति को कई नये अधिकार मिल जाते है
2. यह कार्यपालिका विधायिका को उनके संवैधानिक कर्तव्य करने के लिये बाधित करती है, साथ ही यह भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की सुनिशिचतता करती है
आलोचनाएं
1. ये सामान्य न्यायिक संचालन में बाधा डालती है
2. इनके दुरूपयोग की प्रवृति परवान पे है
इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने खुद कुछ बन्धन इनके प्रयोग पर लगाये है

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