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भारत-यूएस व्यापार समझौता: जश्न मनाने का विषय नहीं: पूर्व मंत्री पी. चिदंबरम

केवल रूपरेखा और रणनीतिक समझौता
विभिन्न पहलुओं और प्रभावों पर गहन विचार की आवश्यकता
अमेरिका ने भारतीय आयात पर 25% शुल्क को घटाकर 18% कर दिया
कुल प्रभावी शुल्क लगभग 50% से घटकर 18%
समझौता किसानों के हितों की अनदेखी कर सकता है
किसान संगठन समझौते को ‘ऐतिहासिक विश्वासघात’ मानता है
कानपुर 07 फरवरी2026
नई दिल्ली: 07 फरवरी2026
भारत-यूएस व्यापार समझौता महत्वपूर्ण विषय बन गया है, जिस पर राजनीतिक नेताओं और विशेषज्ञों में व्यापक चर्चा चल रही है। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने इस समझौते की आलोचना करते हुए इसे केवल एक रूपरेखा करार दिया और इसे जश्न मनाने का विषय नहीं मानते हैं। उन्होंने जोर दिया कि यह एक रणनीतिक समझौता है, लेकिन इसके विभिन्न पहलुओं और प्रभावों पर गहन विचार की आवश्यकता है।
समझौते के मुख्य बिंदु
शुल्क में कमी: इस समझौते के तहत अमेरिका ने भारतीय आयात पर 25% शुल्क को घटाकर 18% कर दिया है। साथ ही, अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क भी हटा दिया गया है, जिससे कुल प्रभावी शुल्क लगभग 50% से घटकर 18% हो गया है।
ऊर्जा में परिवर्तन: भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद को कम करने पर सहमति जताई है और अब वह अपने ऊर्जा स्रोतों को अमेरिका की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहा है।
कृषि उत्पादों पर सुरक्षा: समझौता किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए तय किया गया है, और अमेरिका ने यह सुनिश्चित करने का दावा किया है कि भारत के कृषि क्षेत्रों को सुरक्षा दी जाएगी।
आलोचना के बिंदु
किसानों की चिंता: चिदंबरम और अन्य आलोचकों का कहना है कि यह समझौता किसानों के हितों की अनदेखी कर सकता है। किसानों का संगठन इस समझौते को ‘ऐतिहासिक विश्वासघात’ मानता है, क्योंकि इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों के भारतीय बाजार में प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है।
विवादास्पद मुद्दे: आलोचकों ने इस बात पर चिंता जताई है कि भारत को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए शून्य टैरिफ की अनुमति देने का निर्णय छोटे किसानों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
भविष्य की चुनौतियाँ: विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत किस हद तक अपने ऊर्जा स्रोतों को फिर से निर्धारित करने में सक्षम है, विशेषतः रूस से दूरी बनाते हुए।
व्यापार समझौते के संदर्भ में पूर्व मंत्री चिदंबरम ने चिंता व्यक्त की है कि इसे जश्न मनाने का विषय नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे एक गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संबोध का भाग समझा जाना चाहिए। किसानों की सुरक्षा, कृषि उत्पादों का आयात और विश्व बाजार में भारतीय प्रतिस्पर्धा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोचा जाना चाहिए। समय के साथ, यह समझौता भारत के लिए कई अवसर और चुनौतियों का सामना करने वाला हो सकता है।

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