‘बाजार में मजबूत स्थिति के दुरुपयोग’ और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी विवाद
आरोप: भेदभावपूर्ण मूल्य निर्धारण: अतिरिक्त शर्तें थोपना: अंतिम उपयोग को लेकर पाबंदियां
प्रतिस्पर्धा आयोग ने ग्रासिम को प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 4 के उल्लंघन का दोषी पाया
₹301.61 करोड़ का जुर्माना लगाया।
कानपुर: 2 अगस्त 2026
नई दिल्ली: 2 अगस्त 2026
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) बनाम ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड का मामला भारत के प्रतिस्पर्धा कानून (Competition Law) के तहत ‘बाजार में मजबूत स्थिति के दुरुपयोग’ और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी विवाद है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई, 2026 को निष्पक्ष व्यापार नियामक (CCI) द्वारा ग्रासिम इंडस्ट्रीज पर लगाए गए ₹301.6 करोड़ के जुर्माने को रद्द करने के NCLAT के फैसले को बरकरार रखा है और मामले की नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया है।
इस पूरे कानूनी मामले का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
मार्केट में दबदबा : आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Grasim Industries Ltd.), भारत में विस्कोस स्टेपल फाइबर (VSF) की सबसे बड़ी उत्पादक और एकमात्र विक्रेता है। VSF एक मानव-निर्मित सेल्युलोजिक फाइबर है जिसका उपयोग कपड़ा उद्योग (कपड़े, होम टेक्सटाइल) में होता है।
शिकायत: ‘टेक्सटाइल कंज्यूमर्स फाउंडेशन’ और कुछ अन्य मुखबिरों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि ग्रासिम अपनी इस मजबूत स्थिति का नाजायज फायदा उठा रही है।
CCI का मूल आदेश (मार्च 2020):
2. ग्रासिम पर आरोप:
सीसीआई (CCI) की जांच में कंपनी पर निम्नलिखित मुख्य आरोप सही पाए गए थे:भेदभावपूर्ण मूल्य निर्धारण (Discriminatory Pricing): ग्रासिम अपने ग्राहकों (स्पिनर्स और धागा निर्माताओं) से अलग-अलग और भेदभावपूर्ण कीमतें वसूल रही थी। घरेलू खरीदारों से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के मुकाबले अधिक पैसे लिए जा रहे थे।
अतिरिक्त शर्तें थोपना (Supplementary Obligations): कंपनी अपने ग्राहकों को छूट (Discount) देने के नाम पर उनसे उनके वीएसएफ (VSF) उपभोग और उत्पादन की गोपनीय जानकारी मांग रही थी, जो कि अनुचित था।
व्यापार पर प्रतिबंध: खरीदारों पर अंतिम उपयोग (End-use) को लेकर पाबंदियां लगाई जा रही थीं, ताकि वे फाइबर का व्यापार न कर सकें।
3. NCLAT का फैसला (मई 2026)
ग्रासिम इंडस्ट्रीज ने इस जुर्माने के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में अपील की। 5 मई, 2026 को NCLAT ने जुर्माना रद्द कर दिया।
कारण: NCLAT ने पाया कि CCI की जांच इकाई, महानिदेशक (DG) ने अपनी रिपोर्ट में कुछ बिंदुओं पर ग्रासिम को क्लीन चिट दी थी (जैसे- मूल्य निर्धारण नीति का खुलासा न करना कानूनन अपराध नहीं है)।
जब CCI ने अपने महानिदेशक (DG) के निष्कर्षों से असहमति जताई और अलग फैसला लिया, तो उसने ग्रासिम इंडस्ट्रीज को अपना पक्ष रखने या तर्क प्रस्तुत करने का कोई मौका नहीं दिया। न्यायाधिकरण ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन माना।
4. सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय (31 जुलाई, 2026)
प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने NCLAT के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अपील खारिज: न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने CCI की अपील को खारिज कर दिया।
अदालत का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि नियामक (CCI) जांच महानिदेशक की रिपोर्ट से अलग राय रखता है, तो आरोपी कंपनी को कारण बताओ नोटिस देना और उसकी बात सुनना अनिवार्य है।
वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने सीसीआई को निर्देश दिया है कि वह ग्रासिम इंडस्ट्रीज को निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करे और इस मामले पर नए सिरे से फैसला करे।
इस मामले का महत्व
यह मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून में एक नजीर है। यह स्थापित करता है कि चाहे कोई कंपनी कितनी भी बड़ी क्यों न हो और उस पर बाजार के दुरुपयोग के कितने भी गंभीर आरोप क्यों न हों, CCI जैसी अर्ध-न्यायिक संस्थाएं उचित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के नियमों को दरकिनार नहीं कर सकतीं।










