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सुल्ह एवं वैकल्पिक विवाद समाधान: मध्यस्थता और माध्यस्थम् के बीच अंतर

धारा 89 सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908: अदालत विवादों को ADR भेजने के लिये अधिकृत
आपराधिक और सार्वजनिक हित के मामलो मे उपयोगी नही
‘मध्यस्थता’ और ‘माध्यस्थम्’ दो महत्वपूर्ण विधियाँ
मध्यस्थता के प्रस्ताव को कानून में बंधनकारी नहीं
माध्यस्थम् को एक आधिकारिक और बाध्यकारी प्रक्रिया फैसला अदालत के निर्णय के समानतम
फैसला पक्षों को मानना अनिवार्य होता है.
कानपुर: 13 जून 2026
सुल्ह एवं वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) का उद्देश्य अदालत के बाहर विवादों को सुलझाना है, जो समय और लागत की बचत करता है। सुल्ह एक गैर-बाध्यकारी प्रक्रिया है जिसमें एक तटस्थ सुलहकर्ता दोनों पक्षों के बीच बातचीत कराता है। भारत में सुल्ह और मध्यस्थता का प्रावधान 1996 के अधिनियम के तहत है। ADR के प्रमुख प्रकारों में संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुल्ह, और लोक अदालत शामिल हैं। धारा 89 सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत अदालत को विवादों को ADR के लिए भेजने का अधिकार देती है। यह प्रक्रिया विवाद के तत्वों की पहचान के बाद होती है, जिसमें अदालत समझौते की शर्तें तैयार करती है। ADR के माध्यम से विवाद सुलझाने के लाभों में तेज समाधान, गोपनीयता, और संबंधों में सुधार शामिल हैं। हालांकि, सभी प्रकार के मामले ADR के लिए उपयुक्त नहीं होते, जैसे कि आपराधिक और सार्वजनिक हित के मामले।
मध्यस्थता और माध्यस्थम् के बीच अंतर
भारत में विवाद समाधान की प्रक्रिया में ‘मध्यस्थता’ और ‘माध्यस्थम्’ दो महत्वपूर्ण विधियाँ हैं, जो दोनों ही स्वतंत्र तरीकों से विवादों को सुलझाने का अवसर प्रदान करती हैं, लेकिन इनमें मूलभूत अंतर हैं:
1. परिभाषा और प्रक्रिया
मध्यस्थता (Mediation): मध्यस्थता एक अनौपचारिक प्रक्रिया है जहाँ एक तटस्थ मध्यस्थ विवादित पक्षों के बीच संवाद को सुगम बनाता है। इसमें कोई भी निर्णय नहीं लिया जाता, बल्कि पार्टियों को अपने विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह प्रक्रिया स्वैच्छिक होती है और इसमें आमतौर पर दोनों पक्षों की सहमति आवश्यक होती है.
माध्यस्थम् (Arbitration): माध्यस्थम् को एक आधिकारिक और बाध्यकारी प्रक्रिया माना जाता है। इसमें पक्षों द्वारा एक मध्यस्थ (या मध्यस्थों के समूह) का चयन किया जाता है, जो साक्ष्यों और तर्कों के आधार पर फैसला देता है। यह फैसला अदालत के निर्णय के समानतम होता है और पक्षों को इसे मानना अनिवार्य होता है.
2. कानूनी स्थिति और प्रभाव
मध्यस्थता: यह प्रक्रिया स्वैच्छिक है और इससे निकला निर्णय अधिकारकारी नहीं होता जब तक कि दोनों पक्ष एक सहमति पर नहीं पहुँचते। मध्यस्थता के प्रस्ताव को कानून में बंधनकारी नहीं माना जाता है, यह मुख्यतः संवाद पर केंद्रित है.
माध्यस्थम्: माध्यस्थम् का निर्णय बंधनकारी होता है और इसे सामान्यतः अदालत में मान्यता प्राप्त होती है। यह प्रक्रिया कानूनी ढांचे के अधीन होती है, जिसमें मध्यस्थ का निर्णय न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती जब तक कि कोई विशेष कारण न हो.
3. निष्कर्ष
मध्यस्थता एक संवादात्मक और सहकारी प्रक्रिया है, जबकि माध्यस्थम् एक अधिक औपचारिक, बाध्यकारी और निर्णयात्मक प्रक्रिया है। यह दोनों विधियाँ विवादों का समाधान करने के लिए उपयोगी हैं, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली, प्रभाव और कानूनी स्थिति में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
इन प्रक्रियाओं का उपयोग विभिन्न प्रकार के विवादों जैसे कि व्यापारिक विवाद, पारिवारिक विवाद, आदि, में किया जाता है जो उनकी विशेष जरूरतों और विवाद के प्रकार पर आधारित होता है.

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