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गायत्री मंत्र का उदगम

सूर्य देवता सवितृ को समर्पित
वेदों का सबसे पवित्र और व्यापक रूप से जपा जाने वाला मंत्र
यह धार्मिक मंत्र आध्यात्मिक जागरण और बौद्धिक प्रेरणा का साधन है।
कानपुर: 6 जुलाई 2026
महर्षि विश्वामित्र द्वारा प्रकट किया गायत्री मंत्र का उद्गम ऋग्वेद (मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10) से हुआ है। यह सूर्य देवता सवितृ को समर्पित है। यह मंत्र वेदों का सबसे पवित्र और व्यापक रूप से जपा जाने वाला मंत्र माना जाता है।
उद्गम और इतिहास
ऋग्वेद स्रोत: गायत्री मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद 3.62.10 में मिलता है।
ऋषि: इसे महर्षि विश्वामित्र ने प्रकट किया।
देवता: मंत्र सवितृ (सूर्य देवता) को समर्पित है।
छंद: यह गायत्री छंद में रचा गया है, जिसमें 24 अक्षर होते हैं।
मंत्र का पाठ
संस्कृत (देवनागरी):
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।अर्थ और भाव
ॐ भूर्भुवः स्वः – तीन लोकों (पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग) का आह्वान।
तत्सवितुः – उस परम प्रकाशमान सवितृ का।
वरेण्यं – जो पूजनीय है।
भर्गः देवस्य – दिव्य तेज, जो अज्ञान को दूर करता है।
धीमहि – हम ध्यान करते हैं।
धियो यो नः प्रचोदयात् – वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
यह मंत्र बुद्धि को शुद्ध और प्रकाशित करने की प्रार्थना है।
धार्मिक महत्व
वेदमाता: गायत्री देवी को वेदों की जननी कहा जाता है।
उपनयन संस्कार: प्राचीन काल में इसे यज्ञोपवीत संस्कार में दीक्षा मंत्र के रूप में दिया जाता था।
आधुनिक काल: अब इसे सभी वर्गों के लोग जपते हैं, और यह सार्वभौमिक प्रार्थना बन चुका है।
ध्यान देने योग्य बातें
मंत्र का जप प्रातः, मध्यान्ह और संध्या तीनों समय श्रेष्ठ माना जाता है।
इसे शुद्ध उच्चारण और ध्यानभाव से करना चाहिए।
यह केवल धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण और बौद्धिक प्रेरणा का साधन है।
ॐ भूर्भुवः स्वः

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