अपशब्दों की दौड़ में सबको दिया पछाड़।
जंतर-मंतर बन गया, कोठे वाला गाॅंव
ठोंक रहे हैं पीठ अब,उनकी कुछ गद्दार
जंतर-मंतर बन गया, कोठे वाला गाॅंव
ठोंक रहे हैं पीठ अब,उनकी कुछ गद्दार
सुनीता तिवारी जी की सोशल मीडिया पोस्ट से
कानपुर के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में श्रीमती सुनीता तिवारी एक अत्यंत सम्मानित और सक्रिय कवयित्री के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से किसी भी साहित्यिक आयोजन में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है। वे न केवल स्वयं अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती हैं, बल्कि वरिष्ठ कवयित्रियों के साथ कुशलतापूर्वक समन्वय स्थापित करके काव्य गोष्ठियों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सुनीता तिवारी जी का साहित्यिक योगदान केवल काव्य पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे एक मार्गदर्शक के रूप में भी कई उभरते साहित्यकारों को प्रेरित करती हैं। उनकी अनुभव और ज्ञान से भरी वाणी युवा प्रतिभाओं को सही दिशा प्रदान करती है। वे मानती हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और कवियों का यह दायित्व है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना को जगाएं।
कानपुर की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि वे साहित्य के प्रति कितनी समर्पित हैं। उनका मानना है कि ऐसी गोष्ठियाँ कवियों को एक मंच प्रदान करती हैं जहाँ वे अपने विचारों और भावनाओं को साझा कर सकते हैं, और साथ ही अन्य कवियों की रचनाओं से प्रेरणा भी ले सकते हैं। वे अक्सर यह सुनिश्चित करती हैं कि इन आयोजनों में सभी कवियों को समान अवसर मिले और हर आवाज़ को सुना जाए।
सुनीता तिवारी जी का व्यक्तित्व उनकी कविताओं की तरह ही सहज और प्रभावशाली है। वे अपने मधुर स्वभाव और साहित्यिक समझ से सभी का दिल जीत लेती हैं। कानपुर के साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में उनका योगदान अमूल्य है, और वे सदैव एक प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी। उनकी उपस्थिति मात्र से ही साहित्यिक आयोजन समृद्ध और सफल हो जाते हैं, और यह उनकी अनुपम प्रतिभा का ही परिणाम है।
कानपुर के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में श्रीमती सुनीता तिवारी एक अत्यंत सम्मानित और सक्रिय कवयित्री के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से किसी भी साहित्यिक आयोजन में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है। वे न केवल स्वयं अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती हैं, बल्कि वरिष्ठ कवयित्रियों के साथ कुशलतापूर्वक समन्वय स्थापित करके काव्य गोष्ठियों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सुनीता तिवारी जी का साहित्यिक योगदान केवल काव्य पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे एक मार्गदर्शक के रूप में भी कई उभरते साहित्यकारों को प्रेरित करती हैं। उनकी अनुभव और ज्ञान से भरी वाणी युवा प्रतिभाओं को सही दिशा प्रदान करती है। वे मानती हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और कवियों का यह दायित्व है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना को जगाएं।
कानपुर की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि वे साहित्य के प्रति कितनी समर्पित हैं। उनका मानना है कि ऐसी गोष्ठियाँ कवियों को एक मंच प्रदान करती हैं जहाँ वे अपने विचारों और भावनाओं को साझा कर सकते हैं, और साथ ही अन्य कवियों की रचनाओं से प्रेरणा भी ले सकते हैं। वे अक्सर यह सुनिश्चित करती हैं कि इन आयोजनों में सभी कवियों को समान अवसर मिले और हर आवाज़ को सुना जाए।
सुनीता तिवारी जी का व्यक्तित्व उनकी कविताओं की तरह ही सहज और प्रभावशाली है। वे अपने मधुर स्वभाव और साहित्यिक समझ से सभी का दिल जीत लेती हैं। कानपुर के साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में उनका योगदान अमूल्य है, और वे सदैव एक प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी। उनकी उपस्थिति मात्र से ही साहित्यिक आयोजन समृद्ध और सफल हो जाते हैं, और यह उनकी अनुपम प्रतिभा का ही परिणाम है।
*आज की विभत्स स्थिति पर*
*कुछ दोहे*
बेटी थी मंगल कलश,थी वो स्वस्ति निशान।
जाने किसने विष भरा,बन बैठी शैतान।।
अपशब्दों की दौड़ में सबको दिया पछाड़।
खुद के सॅंग, मां बाप की, इज्जत से खिलवाड़ ।।
आज भरे बाजार में, स्वयं उतारे चीर।
नाच रही निर्लज्ज हो,मरा नैन का नीर।।
जंतर-मंतर बन गया, कोठे वाला गाॅंव।
कोठे शर्मिंदा हुए, धॅंसे जमीं पर पाॅंव।।
ठोंक रहे हैं पीठ अब,उनकी कुछ गद्दार।
चाह रहे हैं सभ्यता,होवे बंटाधार।।
© सुनीता तिवारी कानपुर 









