अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक ऐतिहासिक सुरक्षा समझौते की घोषणा की है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस डील की पुष्टि करते हुए साफ किया कि अब अमेरिका का कोई भी दुश्मन देश (विशेष रूप से रूस और चीन) वाशिंगटन की स्पष्ट लिखित मंजूरी के बिना ग्रीनलैंड में अपना सैन्य बेस नहीं बना पाएगा और न ही वहां कोई संवेदनशील निवेश कर सकेगा।
इस नए त्रिस्तरीय समझौते से जुड़े मुख्य बिंदु और इसके रणनीतिक मायने इस प्रकार हैं:
1. अमेरिका को मिला ‘परमानेंट कंट्रोल’सुरक्षा पर स्थायी नियंत्रण: ट्रंप के मुताबिक, यह एक ‘अनंत काल’ (Infinite Life) का समझौता है जिसका कोई अंत नहीं है। इससे अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा, सैन्य पहुंच, और ओवरफ्लाइट (हवाई क्षेत्र के उपयोग) पर स्थायी अधिकार मिल गए हैं।
मुफ़्त समझौता: ट्रंप ने यह भी दावा किया कि इस डील के लिए अमेरिका को अपनी जेब से कोई अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ेगा।
2. रूस और चीन की घेराबंदीसैन्य बेस और निवेश पर रोक: अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के एक अधिकारी के अनुसार, यह समझौता गैर-नाटो (Non-NATO) देशों को ग्रीनलैंड में पैर पसारने से रोकता है।
खनिजों पर नियंत्रण: ग्रीनलैंड में ‘रेयर अर्थ मिनिरल्स’ (दुर्लभ धातुओं) के विशाल भंडार हैं, जो मोबाइल फोन और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बेहद जरूरी हैं। अब चीन या रूस की कोई भी कंपनी अमेरिकी अनुमति के बिना यहाँ की खदानों या बंदरगाहों में हिस्सेदारी नहीं खरीद पाएगी।
गोल्डन डोम डिफेंस सिस्टम: ट्रंप की महत्वाकांक्षी ‘गोल्डन डोम’ (मिसाइल डिफेंस शील्ड) योजना के लिए ग्रीनलैंड का यह इलाका बेहद अहम है, जो अमेरिका को रूस और चीन के मिसाइल हमलों से सुरक्षा देगा।
3. संप्रभुता डेनमार्क के पास ही रहेगीनहीं बिका ग्रीनलैंड: महीनों तक ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर कब्जा करने की धमकियों और बयानों के बाद, यह समझौता अंततः सैन्य और सुरक्षा सहयोग तक ही सीमित रहा। ग्रीनलैंड की संप्रभुता (Sovereignty) और क्षेत्रीय अखंडता डेनमार्क के पास ही सुरक्षित रहेगी।
सहमति: डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेड्रिक नील्सन ने भी इस समझौते की पुष्टि करते हुए इसे पूरे पश्चिमी गठबंधन के हित में बताया है।
यह समझौता अगले हफ्ते होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक के इतर औपचारिक रूप से साइन किया जाएगा, जिसके बाद इसे लागू करने के लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों से मंजूरी लेनी होगी।









