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स्वतंत्रता संग्राम के एक महान नायक और इंकलाब जिंदाबाद के जनक:मौलाना हसरत मोहानी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1921 में अधिवेशन में अत्यंत साहसिक और दूरदर्शी कदम: पूर्ण स्वतंत्रता की मांग
“इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दिया, जिसका अर्थ है “क्रांति अमर रहे”।
अपनी कलम और अपनी आवाज़ दोनों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी।
मौलाना हसरत मोहानी स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायक जिनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
कानपुर:20 सितम्बर 2026
मौलाना हसरत मोहानी (1875-1951) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे महान सेनानी थे, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में अंकित है। वे न केवल एक निडर स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि उर्दू साहित्य के एक प्रसिद्ध शायर और “इंकलाब जिंदाबाद” जैसे क्रांतिकारी नारे के जनक भी थे, जिसने भारतीय युवाओं में स्वतंत्रता की अलख जगाई। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की मांग उठाई, जो उस समय एक अत्यंत साहसिक और दूरदर्शी कदम था।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
सैयद फ़ज़ल-उल-हसन, जिन्हें दुनिया मौलाना हसरत मोहानी के नाम से जानती है, का जन्म 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहान नामक स्थान पर हुआ था। उनका तख़ल्लुस (उपनाम) ‘हसरत’ था, जिसके साथ उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की। उन्होंने अपनी शिक्षा मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज से प्राप्त की, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से जाना गया। उन्होंने 1903 में इस प्रतिष्ठित संस्थान से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी, उर्दू शायर, पत्रकार, समाजसेवक और इस्लामी विद्वान के रूप में विभिन्न भूमिकाएँ निभाईं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
मौलाना हसरत मोहानी का जीवन भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को समर्पित था। उन्होंने 1903 में “उर्दू-ए-मुअल्ला” नामक एक पत्रिका शुरू की, जिसके माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की खुलकर आलोचना की। यह पत्रिका उनके राष्ट्रवादी विचारों और ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके दृढ़ संकल्प का एक सशक्त माध्यम बन गई।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में1904 में  शामिल  हो गए और राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। 1905 में उन्होंने स्वदेशी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करना और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देना था। उनके राष्ट्रवादी लेखों और ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के कारण, उन्हें 1907 में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा जेल भेज दिया गया, लेकिन उनकी दृढ़ता और साहस कभी कम नहीं हुआ।
1919 में उन्होंने ख़िलाफ़त आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो भारतीय मुसलमानों द्वारा तुर्की के खलीफा के समर्थन में चलाया गया एक आंदोलन था। यह आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एकजुटता का प्रतीक बन गया।
हसरत मोहानी के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में भारत के लिए ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ की मांग था। यह एक क्रांतिकारी विचार था, क्योंकि उस समय कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य स्वशासन या डोमिनियन स्टेटस प्राप्त करना था। उनकी यह मांग आने वाले समय में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा निर्धारित करने वाली थी।
इसी अधिवेशन में उन्होंने “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दिया, जिसका अर्थ है “क्रांति अमर रहे”। यह नारा बाद में भगत सिंह और उनके साथियों द्वारा लोकप्रिय बनाया गया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे शक्तिशाली और प्रेरक नारों में से एक बन गया। यह नारा आज भी परिवर्तन और क्रांति का प्रतीक है।
साहित्यिक योगदान
मौलाना हसरत मोहानी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक असाधारण उर्दू शायर भी थे। उनकी ग़ज़लें आज भी अपनी सुंदरता, गहराई और भावनात्मक अपील के लिए लोकप्रिय हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध ग़ज़लों में से एक है “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है”, जिसे कई प्रसिद्ध गायकों ने गाया है।
उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं:
कुल्लियात-ए-हसरत मोहानी: यह उनकी कविताओं का एक संग्रह है।
शरह-ए-क़लाम-ए-ग़ालिब: यह प्रसिद्ध शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की कविताओं की व्याख्या है, जो उनकी साहित्यिक विद्वत्ता को दर्शाती है।
नुक़ात-ए-सुख़न: यह साहित्यिक आलोचना पर आधारित एक कृति है।
मुशाहिदात-ए-जिंदान: यह उनकी जेल के अनुभवों का वर्णन करती है, जो उनके संघर्ष और दृढ़ संकल्प का प्रमाण है।
मौलाना हसरत मोहानी का निधन 13 मई 1951 को लखनऊ में हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी कलम और अपनी आवाज़ दोनों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। उनका जीवन और कार्य भारतीय इतिहास में एक प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। “इंकलाब जिंदाबाद” का उनका नारा आज भी हर उस व्यक्ति के लिए एक मशाल है जो अन्याय के खिलाफ लड़ता है और परिवर्तन की आकांक्षा रखता है। मौलाना हसरत मोहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे गुमनाम नायक हैं, जिनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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