Home » सर्वोच्च न्यायलय » भारतीय संविधान में सांसद और सर्वोच्च न्यायालय लोकतंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ

भारतीय संविधान में सांसद और सर्वोच्च न्यायालय लोकतंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ

 भारत में न तो संसद पूरी तरह संप्रभु है और न ही न्यायपालिका संविधान सर्वोच्च है।

संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को संसद के भीतर बोलने और वोट देने के लिए विशेष छूट
वोट या भाषण के बदले रिश्वत वाले सांसदों / विधायकों को आपराधिक मुकदमे से छूट नहीं :  7 जज पीठ
 कोर्ट ने 1998 के पुराने ‘पीवी नरसिम्हा राव मामले’ के फैसले को पलट दिया।
कानपुर: जुलाई 19, 2026
नई दिल्ली: जुलाई 19, 2026
भारतीय संविधान में सांसद (Member of Parliament – MP) और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) लोकतंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों—विधायिका और न्यायपालिका—का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन दोनों का संबंध बेहद गहरा और संतुलित है।
सांसदों और सर्वोच्च न्यायालय के बीच संबंधों, उनके अधिकारों और उनसे जुड़े ऐतिहासिक फैसलों की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
1. कानूनों की समीक्षा और सर्वोच्चता (Judicial Review)
  • संविधान की सर्वोच्चता: भारत में न तो संसद पूरी तरह संप्रभु है और न ही न्यायपालिका; यहाँ संविधान सर्वोच्च है।
  • न्यायिक पुनरावलोकन: सांसदों द्वारा संसद में बनाए गए किसी भी कानून को सर्वोच्च न्यायालय संविधान की कसौटी पर परख सकता है। यदि कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों या संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का उल्लंघन करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय उसे खारिज कर सकता है。
2. सांसदों के विशेषाधिकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसले
संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को संसद के भीतर बोलने और वोट देने के लिए विशेष छूट (विशेषाधिकार) दी गई है। हालांकि, हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं:
  • रिश्वत मामले में छूट खत्म (2024): सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि वोट या भाषण के बदले रिश्वत लेने वाले सांसदों और विधायकों को आपराधिक मुकदमे से कोई छूट नहीं मिलेगी। कोर्ट ने 1998 के पुराने ‘पीवी नरसिम्हा राव मामले’ के फैसले को पलट दिया।
  • आपराधिक मामलों पर सख्त रुख: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सांसदों और विधायकों (MPs/MLAs) के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए देश भर में विशेष अदालतें (Special Courts) गठित की गई हैं।
3. सांसदों की अयोग्यता पर कानून (Disqualification)
  • लिली थॉमस मामला (2013): सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, यदि किसी भी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में 2 वर्ष या उससे अधिक की सजा सुनाई जाती है, तो उनकी संसद सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाती है।
4. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
  • संसद के भीतर की कार्रवाई: संविधान के अनुच्छेद 122 के तहत, सर्वोच्च न्यायालय संसद की आंतरिक कार्यवाही की प्रक्रियाओं की जांच नहीं कर सकता।
  • जजों के आचरण पर चर्चा: इसी प्रकार, अनुच्छेद 121 के तहत संसद में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण पर तब तक चर्चा नहीं की जा सकती, जब तक उन्हें हटाने (महाभियोग) का प्रस्ताव न चल रहा हो।

Share This

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted

Recent Post