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श्रीमद्भगवद्गीता दर्शन परिचय: डा. राज मोहन त्रिवेदी

मूल परिचय और संरचना
रचयिता: महर्षि वेदव्यास (महाभारत के अंतर्गत)।
कुल अध्याय: 18 अध्याय।
कुल श्लोक: 700 श्लोक।
कानपुर: जुलाई 18, 2026
श्रीमद्भगवद्गीता दर्शन परिचय: डा. राज मोहन त्रिवेदी
गीता के 700 श्लोक भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद के रूप में प्रस्तुत हैं। इसमें तीन प्रमुख मार्गों की चर्चा की गई है: कर्मयोग, ज्ञानयोग, और भक्तियोग। कर्मयोग का संदेश है कि मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन बिना फल की चिंता किए करना चाहिए। ज्ञानयोग आत्मा की अमरता और विवेक को समझने का मार्ग है। भक्तियोग परमात्मा के प्रति समर्पण और प्रेम की भावना को दर्शाता है। गीता का एक आदर्श व्यक्ति का चित्रण स्थितप्रज्ञ के रूप में किया गया है, जो सुख-दुख में संतुलित रहता है। आधुनिक जीवन में गीता तनाव से मुक्ति, निर्णय लेने की क्षमता और मानसिक शांति प्रदान करती है। यह संन्यास या त्याग की शिक्षा नहीं देती, बल्कि संसार में रहते हुए कर्तव्यों को जागरूकता से निभाने की प्रेरणा देती है।
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय दर्शन का एक अमूल्य और कालजयी ग्रंथ है, जो मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाला ‘मोक्ष शास्त्र’ माना जाता है। महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा यह अद्भुत ग्रंथ केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला  सिखाने वाला व्यावहारिक दर्शन है। कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में जब अर्जुन कर्तव्यविमूढ़ और अवसाद  से घिर गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान रूपी उपदेश दिया, वही गीता दर्शन है।
मूल परिचय और संरचना
रचयिता: महर्षि वेदव्यास (महाभारत के अंतर्गत)।
कुल अध्याय: 18 अध्याय।
कुल श्लोक: 700 श्लोक।
स्वरूप: भगवान श्रीकृष्ण (गुरु) और अर्जुन (शिष्य) के बीच का जीवंत संवाद।
गीता दर्शन के प्रमुख स्तंभ
गीता का दर्शन मुख्य रूप से तीन मार्गों और महत्वपूर्ण जीवन-मूल्यों पर आधारित है:
1. कर्मयोग (कार्रवाई का मार्ग)
गीता का सबसे व्यावहारिक संदेश कर्मयोग है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने सामाजिक और नैतिक दायित्वों (स्वधर्म) का पालन बिना किसी फल की चिंता किए करना चाहिए।
निष्काम कर्म: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” — अर्थात् कर्म करना तुम्हारे हाथ में है, लेकिन उसके परिणाम या फल पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है। फल की आसक्ति ही दुःख का कारण बनती है।
2. ज्ञानयोग (ज्ञान का मार्ग):
यह मार्ग मनुष्य को विवेक और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
आत्मा की अमरता:
गीता सिखाती है कि शरीर मरणशील है, लेकिन उसके भीतर रहने वाली आत्मा शाश्वत, अजन्मी और अमर है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़ देती है।
विवेक: सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के अंतर को समझना ही वास्तविक ज्ञान है।
3. भक्तियोग:
परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम का मार्ग भक्तियोग है।
ईश्वर शरणागति: श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सभी चिंताओं और धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ (“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज”), मैं तुम्हें सभी पापों और भयों से मुक्त कर दूँगा।
4. स्थितप्रज्ञ:
गीता एक ऐसे आदर्श व्यक्ति की कल्पना करती है जो सुख-दुःख, जय-पराजय, लाभ-हानि और मान-अपमान में हमेशा शांत और संतुलित रहता है। मानसिक रूप से स्थिर रहने की इसी कला को समत्वं योग कहा गया है।
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता:
आज के तनाव, अवसाद और प्रतिस्पर्धा वाले युग में गीता दर्शन एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है:
तनाव से मुक्ति:
कर्मफल की चिंता छोड़कर वर्तमान में जीने की प्रेरणा देकर यह मानसिक शांति लाता है।
निर्णय लेने की क्षमता:
कर्तव्य और अकर्तव्य के द्वंद्व में फंसे व्यक्ति को स्पष्टता देता है।
मनोवैज्ञानिक समाधान:
आधुनिक विचारक (जैसे ओशो) श्रीकृष्ण को “मनोविज्ञान का जनक” मानते हैं, जिन्होंने अर्जुन के भ्रमित और खंडित मन का विश्लेषण कर उसे पूर्णता की ओर मोड़ा। गीता भगवद-वाणी है जो संन्यास या संसार का त्याग करना नहीं सिखाती, बल्कि संसार में रहकर अपने कर्तव्यों को पूरी जागरूकता और कुशलता के साथ जीना सिखाती है

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