सत्य जो सदियों से कवियों और दार्शनिकों द्वारा व्यक्त सांसों का क्या भरोसा
पंक्तियाँ हमें जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु की अटल सच्चाई के बारे में बताती
भावपूर्ण श्रद्धांजलि सादर सस्नेह सांसों का क्या भरोसा पंक्तियो मे समर्पित
कानपुर:18 मार्च 2026
राजीव निगम द्वारा अपने मित्र श्री स्व. सर्वेश शुक्ला की माता जी, श्रीमती पद्मा शुक्ला जो 2 मार्च 2026 को उनके सामने ईश्वर मे लीन हो गयी अब हम सब के बीच नहीं हैं, पर उनकी यादें हमेशा दिलों में जिंदा रहें, ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति मिले । को भावपूर्ण श्रद्धांजलि सादर सस्नेह इन पंक्तियो का सांसों का क्या भरोसा मे समर्पित की है।
सांसों का क्या भरोसा,रुक जाए चलते-चलते,जीवन की है जो ज्योति,बुझ जाए जलते-जलते।जीवन है चार दिन का,दो दिन की जिन्दगी,जब आयेगा बुढापा,थक जाये चलते चलते ।सांसों का क्या भरोसा,रुक जाए चलते-चलते,जीवन की है जो ज्योति,बुझ जाए जलते-जलते।समझा न तू इसारा,न समझा खेल इसका,क्यो तेरी बात बिगडी,हर बात बनते बनते ।सांसों का क्या भरोसा,रुक जाए चलते-चलते,जीवन की है जो ज्योति,बुझ जाए जलते-जलते।तेरे साथ जाये बन्दे,तेरे कर्मो की कमाई,जग से गये बादशाह भी यो हाथ मलते मलते ,सांसों का क्या भरोसा,रुक जाए चलते-चलते,जीवन की है जो ज्योति,बुझ जाए जलते-जलते।अब तक न किया पगले,अब हरि स्मरण कर ले,कह रही है जिन्दगी शाम ढलते ढलते,सांसों का क्या भरोसा,रुक जाए चलते-चलते,जीवन की है जो ज्योति,बुझ जाए जलते-जलते।
(संकलनकर्ता देवेश स्वरुप)
राजीव निगम अपने मित्र श्री स्व. सर्वेश शुक्ला की माता जी को समर्पित करते हुये कहते हैं, यह जीवन एक क्षणभंगुर यात्रा है, एक ऐसा सत्य जो सदियों से कवियों और दार्शनिकों द्वारा व्यक्त किया गया है। प्रस्तुत पंक्तियाँ, “सांसों का क्या भरोसा, रुक जाए चलते-चलते”, इसी नश्वरता की याद दिलाती हैं। यह पंक्तियाँ हमें जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु की अटल सच्चाई के बारे में बताती हैं। जिस सांस को हम हर पल लेते हैं, उस पर भी हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। वह किसी भी क्षण रुक सकती है, और जीवन की यह ज्योति, जो जलते-जलते प्रकाश दे रही है, बुझ सकती है।
राजीव निगम कहते हैं, “तेरे साथ जाए बंदे तेरे कर्मों की कमाई”। इस संसार से विदा लेते समय, हमारे साथ केवल हमारे कर्म ही जाते हैं। धन-दौलत, मान-सम्मान सब यहीं रह जाते हैं। बड़े-बड़े बादशाह भी जब इस दुनिया से गए, तो खाली हाथ ही गए, “जग से गए बादशाह भी हाथ मलते-मलते”। वे अपनी सारी शक्ति और वैभव को यहीं छोड़कर चले गए। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भौतिक सुख-सुविधाएं और सांसारिक उपलब्धियाँ मृत्यु के बाद हमारे साथ नहीं जातीं।
राजीव निगम द्वारा की पंक्तियों में चेतावनी भी छिपी है, “अब तक किया ना पगले, अब हरी स्मरण कर ले, कह रही है जिंदगी शाम ढलते-ढलते”। कवि हमें सचेत करते हैं कि हमने अब तक जो कुछ भी किया, यदि वह सार्थक नहीं है, तो अब भी समय है कि हम प्रभु का स्मरण करें। जीवन की शाम ढल रही है, और यह हमें याद दिलाती है कि हमें अपने कर्मों को सुधारना चाहिए और अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। यह एक आह्वान है कि हम अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान दें और अपने अंतिम समय के लिए तैयार रहें।
राजीव निगम द्वारा की पंक्तियों का गहरा अर्थ यह है कि हमें जीवन को पूरी जागरूकता और जिम्मेदारी के साथ जीना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि यह एक क्षणभंगुर यात्रा है, और हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत रहना चाहिए। हमें भौतिक वस्तुओं के मोह से मुक्त होकर आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाना चाहिए। हमें हर पल का सदुपयोग करना चाहिए और अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए, ताकि जब मृत्यु आए, तो हम शांति और संतोष के साथ इस दुनिया से विदा ले सकें। यह पंक्तियाँ हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाती हैं और हमें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं।










