दीपांशी ने कम उम्र में अपने पिता हरीशंकर को खो दिया
कोरोना काल में उनकी मां कुसुमलता का भी निधन हो गया
मुस्लिम दंपती रियासत उर्फ बबलू और उनकी पत्नी शबनम
एक अविस्मरणीय हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायक भूमिका
कानपुर नगर: जुलाई 10, 2026
मुस्लिम दंपती रियासत उर्फ बबलू और पत्नी शबनम उझानी ने बुधवार की रात एक शादी में कौमी एकता की मिसाल पेश की। मुस्लिम दंपती ने युवती को बहन मानकर रिश्ता निभाते हुए शादी के वक्त मां-बाप की भांति सभी रस्में निभाईं। शादी की दावत से लेकर दहेज का सामान भी भेंट किया गया।
साहूकारा मोहल्ला निवासी दीपांशी वार्ष्णेय और कमलकांत की शादी कस्बे के एक बरातघर में हुई। शादी की सभी रस्में रियासत उर्फ बबलू और उनकी पत्नी शबनम ने संपन्न कराईं। बता दें कि दीपांशी के पिता हरीशंकर का उस समय निधन हो गया था, जब वह करीब डेढ़ साल की थीं। मां कुसुमलता ने कोरोना काल में दम तोड़ दिया था।उझानी में कौमी एकता और मानवीय मूल्यों की गहरी जड़ों को दर्शाया जाता है। यह कहानी दीपांशी वार्ष्णेय और कमलकांत के विवाह के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें मुस्लिम दंपती रियासत उर्फ बबलू और उनकी पत्नी शबनम ने एक अविस्मरणीय भूमिका निभाई।यह एक हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायक घटना है जो उत्तर प्रदेश के उझानी में कौमी एकता और मानवीय मूल्यों की गहरी जड़ों को दर्शाती है। यह कहानी दीपांशी वार्ष्णेय और कमलकांत के विवाह के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें मुस्लिम दंपती रियासत उर्फ बबलू और उनकी पत्नी शबनम ने एक अविस्मरणीय भूमिका निभाई।
दीपांशी ने बहुत कम उम्र में अपने पिता हरीशंकर को खो दिया था, और हाल ही में कोरोना काल में उनकी मां कुसुमलता का भी निधन हो गया। ऐसे में, जब दीपांशी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर अकेली खड़ी थीं, तब उनके मोहल्ले के रियासत उर्फ बबलू ने उन्हें अपनी बहन मानकर उनका सहारा बने। यह रिश्ता सिर्फ़ सामाजिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक भी था, जिसे बबलू और उनकी पत्नी शबनम ने हर त्योहार और अवसर पर निभाया।
विवाह की तैयारी से लेकर संपन्न होने तक, बबलू और शबनम ने दीपांशी के माता-पिता की भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल शादी की दावत का इंतजाम किया, बल्कि दहेज का सामान भी भेंट किया, जो उनकी उदारता और स्नेह का प्रतीक है। गोद भराई, मेहंदी, कन्यादान और विदाई जैसी सभी रस्में उन्होंने पूरी शिद्दत और समर्पण के साथ निभाईं, जिससे दीपांशी को कभी अपने माता-पिता की कमी महसूस नहीं हुई।
यह साबित करती है कि प्रेम, भाईचारा और इंसानियत किसी धर्म या जाति की सीमाओं से परे हैं। बबलू और शबनम ने अपने कार्यों से समाज में एक मिसाल कायम की है, जो यह दर्शाती है कि जब हम एक-दूसरे के प्रति करुणा और सम्मान रखते हैं, तो हम एक मजबूत और सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण कर सकते हैं। यह कहानी न केवल दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच के गहरे रिश्ते को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे व्यक्तिगत संबंध सामाजिक ताने-बाने को मजबूत कर सकते हैं। यह घटना हमें याद दिलाती है कि सच्चे मानवीय मूल्य ही हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं और हमें एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।









