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चेक बाउंस:परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 धारा 138

अपर्याप्त धन के कारण चेक का अनादर धारा 138 के तहत एक आपराधिक अपराध
प्राप्तकर्ता को अनादर के 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजना होगा
15 दिनों के भीतर भुगतान की मांग की जाएगी।
कानपुर:15 जुलाई 2026
भारत में चेक बाउंस परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 द्वारा शासित है। कानूनी निहितार्थों के संबंध में मुख्य बिंदु यहां हैं:
मुख्य कानूनी निहितार्थ इस प्रकार हैं:
वैध ऋण (Legal Liability): चेक किसी कानूनी रूप से बाध्यकारी ऋण या देनदारी के भुगतान के लिए ही जारी किया गया होना चाहिए。
समय-सीमा (Timeframe): चेक बाउंस होने के 30 दिनों के भीतर जारीकर्ता को लिखित कानूनी नोटिस भेजना अनिवार्य है। सख्त समय सीमा का पालन महत्वपूर्ण है; किसी भी समय सीमा से चूकने के परिणामस्वरूप मामला खारिज हो सकता है।
कानूनी नोटिस: प्राप्तकर्ता को अनादर के 30 दिनों के भीतर दराज को कानूनी नोटिस भेजना होगा , जिसमें 15 दिनों के भीतर भुगतान की मांग की जाएगी।
भुगतान का अवसर: नोटिस प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान न करने पर ही अपराध पूर्ण होता है
शिकायत दर्ज करना: 15 दिन बीत जाने के बाद, अगले 30 दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज करानी होती है。 यदि आहर्ता निर्धारित समय के भीतर भुगतान करने में विफल रहता है, तो भुगतानकर्ता 30 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कर सकता है कानूनी नोटिस भेजना।
आपराधिक अपराध: भारत में चेक बाउंस होना परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 के तहत एक दंडनीय आपराधिक अपराध है। इसमें चेक जारीकर्ता (Drawer) को 2 साल तक की जेल या चेक राशि से दोगुने तक का जुर्माना (या दोनों) हो सकते हैं
दंड: चेक बाउंस के दंड में शिकायतकर्ता के लिए कारावास, जुर्माना और क्षतिपूर्ति शामिल हो सकती है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) भारत के वाणिज्यिक लेन-देन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधारभूत कानून है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में व्यापार, बैंकिंग तथा वित्तीय लेन-देन की सुचारु व्यवस्था के लिए जिस प्रकार निश्चितता, भरोसा और वैधता आवश्यक है, उसी प्रकार इस अधिनियम की उपस्थिति पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करती है। यह अधिनियम भारत में प्रॉमिसरी नोट (प्रतिज्ञात्मक लिखत), बिल ऑफ एक्सचेंज (विनिमय बिल) और चेक (Cheque) जैसे परक्राम्य लिखतों के निर्माण, अंतरण, दायित्व और प्रवर्तन से संबंधित विस्तृत नियम प्रदान करता है। विशेष रूप से धारा 138 के अंतर्गत चेक अनादरण के मामलों का अपराधीकरण इस अधिनियम का सबसे चर्चित, प्रभावी और व्यावहारिक पहलू है।

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