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इलाहाबाद हाई कोर्ट लखनऊ पीठ : राज्य सरकार ‘उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट 1970’ का इस्तेमाल लगातार दमन और उत्पीड़न के एक हथियार के रूप में कर रही है.:

न्यायपालिका द्वारा लगातार दुरुपयोग की ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद, सरकार अड़ी  है.
ज़िला मजिस्ट्रेट और कमिश्नर ने ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित कर 6 महीने के लिए जिला बदर  का आदेश दिया था.
कानपुर: 12 सितम्बर 2026
लखनऊ: 12 सितम्बर 2026
इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि राज्य सरकार ‘उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट 1970’ (Goonda Act) का इस्तेमाल लगातार दमन और उत्पीड़न के एक हथियार के रूप में कर रही है.
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका द्वारा लगातार इस कानून के दुरुपयोग की ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद, सरकार अपने इस रवैये पर अड़ी हुई है.
मामला क्या था?
यह टिप्पणी जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने गोंडा निवासी ज़ाहिद अली द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की.
गोंडा के ज़िला मजिस्ट्रेट (DM) और देवीपाटन मंडल के कमिश्नर ने ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित कर 6 महीने के लिए जिला बदर (जिले से बाहर) करने का आदेश दिया था.
हाई कोर्ट ने इस आदेश को पूरी तरह खारिज (रद्द) कर दिया.
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
सत्य हिंदी (Satya Hindi) और लाइव लॉ (Live Law) की रिपोर्ट्स के अनुसार कोर्ट ने निम्नलिखित बड़ी बातें कहीं:
सावधानी से हो इस्तेमाल: गुंडा एक्ट एक बेहद शक्तिशाली कानून है. इसका इस्तेमाल बहुत सीमित, स्पष्ट और केवल वास्तविक तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए.
बरी हो चुके मामले का गलत इस्तेमाल: पुलिस ने ज़ाहिद अली के खिलाफ जिन दो पुराने मामलों का हवाला दिया था, उनमें से एक में वह पहले ही बरी हो चुके थे. कोर्ट ने साफ किया कि जिस मामले में कोई व्यक्ति बरी हो चुका है, उसे ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.
एक पुराना केस काफी नहीं: कोर्ट ने पाया कि दूसरा मामला साल 2020 का था. केवल एक पुराने आपराधिक मामले में संलिप्तता से यह साबित नहीं होता कि कोई व्यक्ति ‘आदतन अपराधी’ है. 2020 के केस और 2026 में की गई कार्रवाई के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है.
दुरुपयोग का उदाहरण: अदालत ने ज़ाहिद अली के मामले को इस सख्त कानून के दुरुपयोग का एक ज्वलंत और साफ उदाहरण बताया.
अदालत ने स्पष्ट किया कि गुंडा एक्ट एक प्रिवेंटिव (निवारक) कानून है, जिसका उद्देश्य आदतन अपराधियों को रोकना है, न कि इसका उपयोग किसी निर्दोष नागरिक को बिना किसी ठोस वजह के प्रताड़ित करने के लिए किया जाए
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